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Wednesday, February 25, 2026

पंजाब के गांवों में प्रवासी मजदूरों पर सख्ती

पंजाब : पंजाब के कई गांवों में प्रवासी मजदूरों के खिलाफ सख्त नियम लागू किए जा रहे हैं, जो महाराष्ट्र की पंचायतों की तर्ज पर आधारित हैं। होशियारपुर जिले के लगभग 27 गांवों ने सामूहिक रूप से निर्णय लिया है कि बिना वैध पहचान पत्र के किसी भी प्रवासी मजदूर को उनके गांवों में रहने की अनुमति नहीं होगी। इसके साथ ही, पंचायतें अब ऐसे मजदूरों के लिए निवास प्रमाण पत्र जारी करने से भी इनकार कर रही हैं। इस फैसले के पीछे 9 सितंबर को होशियारपुर में हुई एक दुखद घटना को प्रमुख कारण माना जा रहा है, जिसमें एक प्रवासी मजदूर पर पांच साल की बच्ची की हत्या का आरोप लगा था। इस घटना ने स्थानीय लोगों में प्रवासियों के प्रति आक्रोश को बढ़ा दिया है।

पंचायतों का सख्त फैसला

13 सितंबर को बजवाड़ा गांव में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक में चक साधु, सिंहपुर, नंदन, बसी बहीआं, डाडा, किला बरून, अल्लाहाबाद, बिलासपुर और आनंदगढ़ जैसे गांवों के सरपंचों ने हिस्सा लिया। इस बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित हुआ कि केवल पंजाब सरकार द्वारा जारी वैध पहचान पत्र, जैसे आधार या पैन कार्ड, रखने वाले प्रवासी मजदूरों को ही गांव में रहने की अनुमति दी जाएगी। चब्बेवाल पंचायत ने इस दिशा में सबसे पहले कदम उठाते हुए रविवार को यह प्रस्ताव पारित किया। पंचायत सदस्य चरणजीत सिंह, जो सरपंच रीना सिद्धू के पति हैं, ने बताया कि अन्य गांव भी इसी तरह के कदम उठाने की तैयारी में हैं।

प्रशासन से सहयोग की मांग

पंचायतों ने उपायुक्त आशिका जैन को पत्र लिखकर इन नियमों को लागू करने के लिए प्रशासनिक सहायता मांगी है। उनका कहना है कि प्रवासी मजदूरों के दस्तावेजों की जांच तभी होगी, जब उनके पास पंजाब में जारी सरकारी पहचान पत्र हों। बजवाड़ा के सरपंच राजेश कुमार उर्फ बॉबी माहे ने स्पष्ट किया कि बिना वैध दस्तावेज वाले मजदूरों को गांव छोड़ने के लिए कहा गया है। किराए पर रहने वाले मजदूरों के मकान मालिकों को पंचायत को लिखित आश्वासन देना होगा कि वे उनके आचरण की जिम्मेदारी लेंगे। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ प्रवासियों ने पंचायत की जमीन पर अवैध कब्जा कर मकान बना लिए और बिजली-पानी के कनेक्शन तक हासिल कर लिए।

अन्य गांवों में भी सख्ती

बदला पंचायत ने विशेष रूप से गुज्जर समुदाय के प्रवासियों का उल्लेख करते हुए कहा कि अपराध रिकॉर्ड वाले प्रवासियों को सरपंच को सूचित करना होगा। साथ ही, किसानों को अपने खेतों में काम करने वाले मजदूरों की जानकारी पंचायत के साथ साझा करनी होगी। पुरहीरां गांव ने भी इसी तरह का प्रस्ताव पारित किया है। बठिंडा जिले के डीपीस और गहेरी भागी गांवों ने भी प्रवासियों पर प्रतिबंध लगाए हैं। डीपीस पंचायत ने घोषणा की कि बाहरी लोगों को गांव में प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा, जबकि गहेरी भागी पंचायत ने कहा कि प्रवासी न तो संपत्ति खरीद सकते हैं और न ही वोटर कार्ड या आधार कार्ड बनवा सकते हैं। वे केवल खेतों में बने ट्यूबवेल या अस्थायी झोपड़ियों तक सीमित रहेंगे। भारतीय किसान यूनियन (सिद्धपुर) ने इन फैसलों का समर्थन करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश और बिहार से आने वाले प्रवासी सामाजिक ढांचे को प्रभावित कर रहे हैं।

मुख्यमंत्री की प्रतिक्रिया

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इन फैसलों पर चेतावनी जारी करते हुए कहा कि किसी भी प्रकार का भेदभाव बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने तर्क दिया कि यदि पंजाब में प्रवासियों को निशाना बनाया गया, तो अन्य राज्यों में बसे पंजाबी व्यापारियों को भी इसी तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने इसे अनुचित ठहराया।

पहले भी हो चुके हैं ऐसे फैसले इससे पहले, जुलाई में फतेहगढ़ साहिब के लखनपुर गढ़चा पट्टी गांव ने अवैध रूप से बसे प्रवासियों को एक सप्ताह में गांव खाली करने का आदेश दिया था। पिछले साल मंसा जिले के जवाहरके गांव की पंचायत ने प्रस्ताव पारित किया था कि कोई भी स्थानीय निवासी प्रवासियों से विवाह नहीं करेगा, अन्यथा उसे गांव से निष्कासित कर दिया जाएगा।

पंजाब के गांवों में प्रवासी मजदूरों के खिलाफ बढ़ती सख्ती स्थानीय समुदायों में असुरक्षा और आक्रोश को दर्शाती है। हालांकि, मुख्यमंत्री ने भेदभाव के खिलाफ चेतावनी दी है, लेकिन पंचायतों का यह कड़ा रुख सामाजिक और प्रशासनिक चुनौतियों को उजागर करता है। यह मामला न केवल स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर प्रवास और सामुदायिक एकीकरण के मुद्दों पर भी ध्यान आकर्षित कर रहा है।

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