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Wednesday, February 25, 2026

‘लिटिल निर्भया’ केस में दोषियों को किया बरी

उत्तराखंड : उत्तराखंड में साल 2014 की चर्चित सात वर्षीय बच्ची के बलात्कार और हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि मृत्युदंड जैसे कठोर दंड देने से पहले निचली अदालतों को बेहद सतर्क रहना चाहिए।

इस मामले को राज्यभर में ‘लिटिल निर्भया केस’ के नाम से जाना गया था, जिसने उस समय भारी आक्रोश पैदा किया था। निचली अदालत और उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक आरोपी को फांसी की सज़ा और दूसरे को सात साल कैद की सज़ा दी थी, लेकिन अब शीर्ष अदालत ने दोनों को बरी कर दिया है।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, संजय करोल और संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में असफल रहा। पूरा मामला केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था और जांच में कई खामियां पाई गईं। पीठ ने स्पष्ट किया कि इस तरह की कमज़ोर गवाही और अधूरी कड़ियों पर किसी को मौत की सज़ा नहीं दी जा सकती।

अपने निर्णय में न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने कहा कि मृत्युदंड केवल ‘दुर्लभ से दुर्लभ’ मामलों में ही दिया जाना चाहिए। उन्होंने लिखा, “यह सज़ा अपरिवर्तनीय है, इसलिए इसमें ज़रा-सा भी संदेह या कमी अभियोजन के खिलाफ जानी चाहिए। जल्दबाज़ी या यांत्रिक ढंग से दी गई फांसी की सज़ा न्याय व्यवस्था को कमजोर कर सकती है और किसी निर्दोष की ज़िंदगी हमेशा के लिए खत्म होने का खतरा पैदा करती है।”

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