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Wednesday, February 25, 2026

पुरुषों के अधिकारों की रक्षा हेतु ऐतिहासिक कदम

नई दिल्ली: राज्यसभा सांसद डॉ. अशोक कुमार मित्तल ने संसद के उच्च सदन में एक निजी विधेयक “राष्ट्रीय पुरुष आयोग विधेयक, 2025” पेश किया है। यह विधेयक लैंगिक रूप से पक्षपातपूर्ण समझे जाने वाले मौजूदा कानूनों के कथित दुरुपयोग को रोकने तथा पुरुषों के अधिकारों की संस्थागत सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है। पिछले सप्ताह विधेयक को सदन में पेश करने की अनुमति मिल चुकी है और यह लैंगिक न्याय तथा कानूनी सुधारों पर व्यापक बहस को जन्म दे रहा है।

स्वतंत्र राष्ट्रीय पुरुष आयोग का गठन प्रस्तावित

विधेयक के तहत विधि एवं न्याय मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त “राष्ट्रीय पुरुष आयोग” (NCM) स्थापित करने का प्रावधान है। आयोग में राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त अध्यक्ष, लैंगिक संतुलन बनाए रखते हुए छह सदस्य तथा भारत के मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा नामित एक विधिक सलाहकार शामिल होंगे। आयोग को पुरुषों की शिकायतों की जांच, लिंग-विशिष्ट कानूनों में संशोधन की सिफारिश, पुलिस प्रक्रियाओं की निगरानी, मीडिया कवरेज नियमन तथा मानसिक स्वास्थ्य सहायता जैसे व्यापक अधिकार प्राप्त होंगे।

दहेज, घरेलू हिंसा और झूठे यौन उत्पीड़न मामलों में सख्त दंड का प्रावधान

विधेयक में दहेज प्रतिषेध, घरेलू हिंसा, कार्यस्थल उत्पीड़न, यौन अपराध तथा बाल संरक्षण से जुड़े दर्जनों कानूनों में संशोधन प्रस्तावित हैं। विशेष रूप से भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के दुरुपयोग पर अंकुश लगाने हेतु गिरफ्तारी से पूर्व 30 दिनों के भीतर प्रारंभिक जांच अनिवार्य की गई है।

  • झूठी 498A शिकायत सिद्ध होने पर शिकायतकर्ता को 5 वर्ष तक की कैद तथा 25 लाख रुपये तक जुर्माना और मानहानि क्षतिपूर्ति का प्रावधान।
  • झूठा बलात्कार आरोप लगाने पर 7 से 10 वर्ष की सजा एवं 10 लाख रुपये जुर्माना।
  • घरेलू हिंसा के झूठे मामले में 3 वर्ष तक कैद एवं 5 लाख रुपये जुर्माना।
  • कार्यस्थल यौन उत्पीड़न के झूठे आरोप में 5 वर्ष तक की सजा एवं 10 लाख रुपये जुर्माना।

तलाक के बाद भी बच्चे को मिलेगा माता-पिता का प्यार

विधेयक में तलाक के सभी मामलों में डिफॉल्ट रूप से “संयुक्त अभिभावकत्व” (shared parenting) लागू करने का प्रस्ताव है, जब तक कि यह बच्चे के हित में न हो। एक अभिभावक द्वारा दूसरे को बच्चे से जानबूझकर दूर करने (parental alienation) पर 10 लाख रुपये जुर्माना एवं 2 वर्ष तक की कैद का प्रावधान रखा गया है।

बिना अदालती फैसले के दोषी करार पर 50 लाख जुर्माना

उच्च प्रोफाइल मामलों में अक्सर देखे जाने वाले “मीडिया ट्रायल” को रोकने के लिए सख्त प्रावधान किए गए हैं। अदालत के फैसले से पहले किसी आरोपी को दोषी बताने पर मीडिया हाउस एवं डिजिटल प्लेटफॉर्म पर 50 लाख रुपये जुर्माना तथा 48 घंटे के भीतर सार्वजनिक माफी का प्रावधान है। सोशल मीडिया पर असत्यापित आरोप फैलाने वालों को 3 वर्ष कैद एवं 25 लाख रुपये जुर्माना हो सकता है। प्लेटफॉर्म को अदालती आदेश मिलने के 24 घंटे के भीतर आपत्तिजनक सामग्री हटानी होगी।

तेज न्याय के लिए विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतें

झूठे आरोप एवं बाल अभिभावकत्व विवादों के मामलों को छह माह के भीतर निपटाने के लिए विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतें स्थापित करने का निर्देश केंद्र सरकार को दिया गया है। आयोग के गठन, कानूनी सहायता, मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम, मीडिया जवाबदेही तथा घरेलू हिंसा-बाल संरक्षण तंत्र को मजबूत करने के लिए 2025-2030 तक 3,650 करोड़ रुपये का बजट प्रस्तावित है।

पुरुष अधिकार कार्यकर्ताओं में उत्साह, महिला अधिकार संगठनों में सतर्कता

पुरुष अधिकार कार्यकर्ता दीपिका नारायण भारद्वाज सहित कई हस्तियां इस विधेयक को “पुरुषों के लिए उम्मीद की किरण” बता रही हैं, विशेष रूप से बढ़ती पुरुष आत्महत्या दर और लंबे पारिवारिक मुकदमों के संदर्भ में। हालांकि महिला अधिकार संगठनों ने चेतावनी दी है कि कानूनों के दुरुपयोग को रोकने के उपाय जरूरी हैं, परंतु महिलाओं की मौजूदा कानूनी सुरक्षा को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।

चूंकि यह निजी विधेयक है, इसे कानून बनने के लिए संसद के दोनों सदनों में व्यापक राजनीतिक समर्थन की आवश्यकता होगी।

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