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Wednesday, February 25, 2026

दिल्ली सुप्रीम कोर्ट में धार्मिक टिप्पणी से उपजा विवाद

दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के दौरान एक अप्रत्याशित घटना ने पूरे न्यायिक हलकों में हलचल मचा दी है। 71 वर्षीय अधिवक्ता राजेश किशोर ने मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) बी.आर. गवई पर जूता फेंकने का प्रयास किया, जो खजुराहो मंदिर में भगवान विष्णु की मूर्ति की क्षति से जुड़ी टिप्पणी से उत्पन्न आक्रोश का परिणाम था। यह घटना न केवल न्यायपालिका की गरिमा पर सवाल खड़ी करती है, बल्कि धार्मिक संवेदनशीलता और न्यायिक भाषा के उपयोग पर भी बहस छेड़ रही है।

मामला तब तूल पकड़ गया जब एक याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च अदालत में दायर याचिका के माध्यम से मांग करी कि खजुराहो के प्रसिद्ध मंदिर परिसर में स्थापित भगवान विष्णु की प्राचीन मूर्ति की तत्काल मरम्मत सुनिश्चित की जाए। इस याचिका पर सुनवाई के क्रम में जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया, तर्क देते हुए कहा कि, “यह विषय न्यायिक दायरे से बाहर है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के क्षेत्राधिकार में आता है।”

मुख्य न्यायाधीश ने इसे “प्रचार-प्रधान याचिका” करार देते हुए खारिज कर दिया। उन्होंने एक विवादास्पद टिप्पणी भी की, जिसमें कहा गया कि, “यदि याचिकाकर्ता विष्णु के प्रबल अनुयायी हैं, तो वे स्वयं भगवान से प्रार्थना कर मरम्मत का अनुरोध करें।”

इस टिप्पणी ने विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संगठनों को आहत होने की बात सामने आरही है। विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) जैसे संगठनों ने कड़ी निंदा की, यह जोर देकर कहा कि सार्वजनिक मंचों पर वाणी पर पूर्ण संयम आवश्यक है, क्योंकि ऐसी टिप्पणियां धार्मिक भावनाओं का अपमान करती प्रतीत होती हैं। लेकिन वहीं दूसरी ओर, दलित संगठनों ने इस घटना को जातिगत पूर्वाग्रह से जोड़ते हुए विरोध दर्ज किया। उनका मत है कि सीजेआई गवई, जो दलित समुदाय से सम्बंध रखते हैं, पर इस प्रकार का हमला उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण ही लक्षित था, जो असहनीय है।

जूता फेंकने वाले अधिवक्ता राजेश किशोर ने अपने कृत्य पर कोई पश्चाताप व्यक्त नहीं किया बल्कि उन्होंने स्पष्ट किया कि सनातन धर्म के प्रति किसी भी अपमान को भारत किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं करेगा।

हालाँकि, CJI द्वारा उक्त टिप्पडी उस वक्त बहस के दौरान दी गयी जब उक्त याचिका को रद्द किये जाने का फ़ैसला लिया जा रहा था और अधिवक्ता राजेश किशोर ऐसा क़तई नहीं चाहते थे, महसूस होता है कि उपरोक्त अधिवक्ता और CJI के बीच गहन बहस चल रही होगी जो ऐसी टिप्पडी CJI द्वारा की गयी।

इस बीच, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया साझा की। उन्होंने इस कृत्य की निंदा तो की, लेकिन सीजेआई की टिप्पणी को अनुचित, असंगत और मामले से अप्रासंगिक ठहराया। काटजू ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई न्यायाधीश मस्जिद विध्वंस से सम्बंधित याचिका पर सुनवाई के दौरान कहें कि “अल्लाह या पैगंबर मोहम्मद से ही पुनर्निर्माण करवाइए”, तो इसका क्या परिणाम होगा? उन्होंने सलाह दी कि न्यायाधीशों को अदालत में न्यूनतम बोलना चाहिए और धार्मिक प्रवचनों या व्याख्यानों से बचना चाहिए।

हालाँकि यह स्पष्ट है कि अगर माननीय CJI महोदय द्वारा उक्त टिप्पडी की गयी तो अधिवक्ता को जूता फेंकने का प्रयास नहीं करना चाहिये था बल्कि उक्त टिप्पडी का विरोध ग़ुस्से को क़ाबू करके करना चाहिये था।

विशेषज्ञों के अनुसार, सीजेआई इस विवाद को अनावश्यक रूप से बढ़ावा नहीं देना चाहते। उन्होंने जूता फेंकने वाले अधिवक्ता के विरुद्ध कोई सख्त कार्रवाई करने से इंकार कर दिया है, जो मामले को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने की दिशा में एक कदम माना जा रहा है।

इस घटना पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी गहन दुख व्यक्त किया, यह कहते हुए कि जस्टिस गवई के विरुद्ध यह व्यवहार समस्त राष्ट्र के सम्मान को आहत करता है। हालांकि, प्रधानमंत्री महोदय की प्रतिक्रिया में विलंबित दिखाई दिया, जो राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है।

यह घटना न्यायपालिका की स्वतंत्रता, धार्मिक संवेदनशीलता और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर देती है। आगे की प्रक्रिया पर नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि यह भारतीय लोकतंत्र के मूल्यों को परखने का अवसर प्रदान करती है।

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