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Wednesday, February 25, 2026

क्या बीजेपी चला रही है सवर्ण-विरोधी राजनीति का खेल?

मध्य प्रदेश: भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की हालिया नीतिगत पहलों ने सोशल मीडिया पर व्यापक बहस छेड़ दी है, खासकर आरक्षण से जुड़े फैसलों को लेकर। मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 73 प्रतिशत आरक्षण प्रदान करना एक ऐसा कदम है, जिसने सामान्य वर्ग के लोगों में गहरी नाराजगी पैदा कर दी है।

कई विश्लेषकों का मानना है कि यह निर्णय सामान्य श्रेणी के युवाओं को अवसरों से वंचित कर रहा है, जिससे सामाजिक तनाव बढ़ रहा है।

विपक्षी दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा लगाए जा रहे आरोपों के केंद्र में यह सवाल है कि क्या बीजेपी पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जातियों (एससी) के समर्थन हासिल करने के प्रयास में सवर्ण जातियों के प्रति भेदभावपूर्ण रुख अपना रही है?

इस नीति से प्रभावित होने वाले सामान्य वर्ग के अभिभावक और छात्रों का कहना है कि आरक्षण व्यवस्था अब संतुलन खो चुकी है, और यह युवाओं के भविष्य को खतरे में डाल रही है। क्या यह परिवर्तन सवर्ण समुदाय को बीजेपी से अलग-थलग कर देगा? यह प्रश्न राजनीतिक हलकों में तेजी से गूंज रहा है।

इस मुद्दे पर बुद्धिजीवियों और सामाजिक टिप्पणीकारों की प्रतिक्रियाएं भी तीखी रही हैं। उदाहरणस्वरूप, आरक्षण विरोधी रुख अपनाने वाले वरिष्ठ पत्रकार अजीत भारती के विरुद्ध अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत गैर-जमानती प्राथमिकी दर्ज की गई है।

भारती ने उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बी.आर. गवई के बयानों पर टिप्पणी करते हुए हिंदू देवी-देवताओं के अपमान को असहनीय बताते हुए कड़ा विरोध जताया था। देश भर के सवर्ण बुद्धिजीवियों ने इस संदर्भ में निम्नलिखित प्रमुख चिंताएं व्यक्त की हैं:

  1. आरक्षण विस्तार का अन्यायपूर्ण प्रभाव: ओबीसी और दलित समुदायों को दिए जा रहे आरक्षण को सवर्णों के अधिकारों का हनन माना जा रहा है, जो सामाजिक समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।
  2. प्रधानमंत्री की चुप्पी पर सवाल: जस्टिस गवई द्वारा भगवान विष्णु का कथित अपमान होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौन प्रतिक्रिया से नाराजगी है, जबकि उसी जज पर जूता फेंकने की घटना पर उन्होंने तत्काल खेद व्यक्त किया था। यह दोहरा मापदंड प्रतीत होता है।
  3. कानूनी सख्ती का दुरुपयोग: बीजेपी सरकार द्वारा एससी/एसटी कानून में संशोधन से सवर्ण समुदाय पर मनमाने या झूठे मुकदमों का खतरा बढ़ गया है, जो न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।
  4. बिहार मॉडल का समर्थन: पार्टी द्वारा बिहार में पिछड़े वर्गों के लिए 85 प्रतिशत आरक्षण की वकालत करना भी सामान्य वर्ग के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि इससे मेरिट-आधारित अवसरों पर असर पड़ सकता है।

अब सवाल यह उठता है कि क्या बीजेपी इन आलोचनाओं और सवर्ण असंतोष को ध्यान में रखते हुए अपनी रणनीति में बदलाव लाएगी? या फिर पिछड़े और दलित समुदायों के हितों की रक्षा करते हुए उसे सवर्ण वोट बैंक के क्षरण का सामना करना पड़ेगा? यह राजनीतिक संतुलन का एक जटिल दौर है, जहां सामाजिक न्याय और समावेशी विकास के बीच संतुलन बनाना बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।

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