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Wednesday, February 25, 2026

उत्तर प्रदेश में अभूतपूर्व बारिश: कृषि और शहरों पर संकट

अलीगढ़ से विशेष रिपोर्ट

अलीगढ़: उत्तर प्रदेश में सितंबर 2025 की शुरुआत के साथ ही मानसून ने अपना अप्रत्याशित रंग दिखाना शुरू कर दिया है। मौसम विज्ञानियों और विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार की बारिश न केवल सामान्य से अधिक होगी, बल्कि यह पिछले एक दशक के रिकॉर्ड को भी ध्वस्त कर सकती है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर सालेहा जमाल ने चेतावनी दी है कि यह असामान्य वर्षा न केवल कृषि क्षेत्र को प्रभावित करेगी, बल्कि शहरी क्षेत्रों में भी गंभीर समस्याएं खड़ी कर सकती है।

बारिश का रिकॉर्ड तोड़ प्रकोप

भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के अनुसार, सितंबर में 109 प्रतिशत तक अधिक वर्षा होने की संभावना है, जो सामान्य से कहीं अधिक है। उत्तर प्रदेश के 50 से अधिक जिलों, जिनमें अलीगढ़, प्रयागराज, सीतापुर, सहारनपुर, शामली और मुजफ्फरनगर शामिल हैं, में भारी बारिश की चेतावनी जारी की गई है। उत्तर भारत के अन्य राज्यों जैसे हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर में भी रेड और ऑरेंज अलर्ट लागू हैं।

हथिनी कुंड बैराज से छोड़े गए पानी ने दिल्ली-एनसीआर में बाढ़ का खतरा बढ़ा दिया है। प्रो. सालेहा के अनुसार, इस अतिवृष्टि का सबसे बड़ा प्रभाव खरीफ फसलों जैसे धान, मक्का और गन्ने पर पड़ेगा। लंबे समय तक जलभराव से ये फसलें पूरी तरह नष्ट हो सकती हैं, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।

किसानों के लिए चुनौती

प्रो. सालेहा ने बताया कि इस बार की बारिश पिछले 10 वर्षों के औसत को पार कर सकती है। खरीफ फसलों की बुआई का यह समय किसानों के लिए महत्वपूर्ण होता है, लेकिन अत्यधिक बारिश और जलभराव से फसलों को अपूरणीय क्षति होने का खतरा है। उन्होंने सुझाव दिया कि किसानों को जल निकासी की उचित व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए। “अगर खेतों में पानी अधिक समय तक रुका रहा, तो फसलें सड़ सकती हैं। किसानों को तत्काल जल प्रबंधन की रणनीति अपनानी होगी,” उन्होंने कहा।

शहरी क्षेत्रों में जलभराव और अव्यवस्थित शहरीकरण

शहरी क्षेत्रों में भी स्थिति चिंताजनक है। अलीगढ़, प्रयागराज और दिल्ली-एनसीआर जैसे क्षेत्रों में भारी बारिश के कारण जलभराव और बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो रही है। प्रो. सालेहा ने इस समस्या का मूल कारण अव्यवस्थित शहरीकरण को बताया। “हमारे शहरों का विकास पर्यावरण को ध्यान में रखकर नहीं किया गया। अनियोजित निर्माण और अपर्याप्त जल निकासी व्यवस्था के कारण पानी सड़कों और घरों में भर रहा है,” उन्होंने कहा।

विशेषज्ञों का मानना है कि नियोजित शहरीकरण और पर्यावरण-अनुकूल विकास नीतियों के माध्यम से इन समस्याओं को कम किया जा सकता है। प्रो. सालेहा ने सुझाव दिया कि स्थानीय प्रशासन को जल निकासी प्रणालियों को मजबूत करने और हरित क्षेत्रों को बढ़ावा देने पर ध्यान देना चाहिए।

भविष्य के लिए सबक

यह असामान्य मानसून न केवल वर्तमान में चुनौतियां पेश कर रहा है, बल्कि भविष्य के लिए भी एक चेतावनी है। प्रो. सालेहा ने जोर देकर कहा कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। “हमें अपनी कृषि और शहरी नियोजन प्रणालियों को जलवायु-अनुकूल बनाना होगा। टिकाऊ विकास और पर्यावरण संरक्षण के बिना, ऐसी आपदाओं का सामना करना और कठिन होता जाएगा,” उन्होंने चेतावनी दी।

उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में यह बारिश न केवल मौसम का एक असामान्य चक्र है, बल्कि यह हमारी तैयारियों और नीतियों की परीक्षा भी है। किसानों, शहरी योजनाकारों और प्रशासन को एकजुट होकर इस संकट से निपटने की आवश्यकता है, ताकि नुकसान को कम किया जा सके और भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से बचा जा सके।

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