नई दिल्ली: भारत सरकार द्वारा 2019 में लागू किया गया मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम मुस्लिम महिलाओं के वैवाहिक अधिकारों को मजबूत बनाने का एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ है। इस विधेयक को संसद द्वारा पारित करने के बाद, तलाक-ए-बिद्दत के रूप में जाना जाने वाला तत्काल तीन तलाक अब पूर्णतः अवैध घोषित हो चुका है।
इस कानून के अंतर्गत, यदि कोई पुरुष इस प्रथा का सहारा लेता है, तो उसे दस वर्ष तक की कठोर कारावास और आर्थिक दंड का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही, प्रभावित महिला और उसके बच्चों के लिए भरण-पोषण का उचित प्रावधान भी सुनिश्चित किया गया है, जो आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनने में सहायक सिद्ध हो रहा है।
कानून के प्रारंभिक चरण में, कुछ मुस्लिम महिलाओं द्वारा शरिया परंपराओं के अनुरूप वैवाहिक विच्छेद की स्वतंत्रता पर जोर देते हुए इसका विरोध दर्ज किया गया था। वे तर्क देती थीं कि यह विधान उनकी धार्मिक स्वायत्तता में हस्तक्षेप करता है।
हालांकि, सामाजिक परिवर्तनों के साथ-साथ संवैधानिक प्रक्रियाओं के लाभों को समझते हुए, अब महिलाएं इस कानून को एक प्रभावी उपकरण के रूप में अपनाने लगी हैं। विशेष रूप से, शरिया के अंतर्गत गुजारा भत्ता प्राप्त करना कठिन होता है, जबकि यह अधिनियम महिलाओं को अन्य समुदायों की महिलाओं की भांति आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता है।
हाल के वर्षों में जागरूकता अभियानों के फलस्वरूप, महिलाओं में इस कानून के सकारात्मक आयामों की समझ बढ़ी है, और इसका उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। उत्तर प्रदेश इस संदर्भ में अग्रणी राज्य के रूप में उभरा है, जहां तीन तलाक से संबंधित मुकदमों की संख्या उल्लेखनीय रूप से अधिक है।
रिपोर्टों और सर्वोच्च न्यायालय के वकीलों के अनुसार, अलीगढ़ जिले की महिलाएं तीन तलाक के मामलों में सबसे सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
कानून लागू होने के बाद से अलीगढ़ में 162 मामले दर्ज किए गए हैं, जबकि आगरा में 61, कासगंज में 47, मथुरा में 43, फिरोजाबाद में 38 तथा हाथरस में 13 मामले दर्ज हो चुके हैं। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि कानूनी जागरूकता ग्रामीण और शहरी स्तर पर कैसे फैल रही है, जिससे महिलाएं अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आ रही हैं।
हालांकि, इस कानून के कार्यान्वयन में कुछ चुनौतियां भी सामने आई हैं, जहां इसका दुरुपयोग होना भी कहा जा रहा है;
- ग्राम खगोई (ब्लॉक सिम्भावली) जनपद हापुड़ स्थित एक मुस्लिम महिला शबाना ने अपने पति इमरान निवासी अलीगढ़ के खिलाफ तीन तलाक का आरोप लगाते हुए मामला दर्ज कराया। शादी के करीब सात वर्ष बाद, महिला ने दावा किया कि पति ने आपराधिक तरीक़े से मौखिक रूप से तीन तलाक दे दिया। दूसरी ओर, इमरान का तर्क है कि शबाना ने अपने सास ससुर की संपत्ति हड़पने के लिये साजिश रचकर ससुराल छोड़ दिया और गहने-कपड़े एवं नक़दी ले कर मायके चली गई उपरांत इसके इमरान ने समय समय पर नियमानुसार तीन कागजी नोटिस बाबत तलाक़ वर्ष 2018 में ही भेज दिये थे, लेकिन शबाना द्वारा नोटिस को मौन स्वीकृति दी गयी और साथ रहने की कोई बात महिला द्वारा ज़ाहिर नहीं की गयी लेकिन महिला ने अपने परिवार के सदस्यों के सहयोग से झूठे आरोप गढ़े, जिनमें दहेज उत्पीड़न, हत्या का प्रयास और अन्य गंभीर धाराएं शामिल हैं। इमरान के अनुसार, शबाना को इद्दत की राशि के रूप में करीब 20,000 रुपये एवं अंतिम तलाक़ के नोटिस के साथ 10000 रुपये का चेक देना बताया गया है, मामला वर्तमान में अदालत में लंबित है, जहां महिला की ओर से कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं हो सका।
- चंडीगढ़ में एक अन्य घटना ने कानून के दुरुपयोग पर सवाल खड़े किए हैं। स्थानीय निवासी नाजमीन ने अपनी मित्र नूरजहां पर आरोप लगाया कि उसने पति नाजिम को झूठे तीन तलाक के केस में फंसाकर जेल भेज दिया। बिहार के किशनगंज निवासी नाजिम और नूरजहां के चार बच्चे हैं, लेकिन वैवाहिक विवाद के कारण नूरजहां ने अपनी बड़ी बेटी को भी गलत गवाही के लिए उकसाया। पुलिस स्टेशन में उन्होंने फोन पर तलाक दिए जाने का दावा किया, लेकिन कॉल रिकॉर्डिंग या अन्य प्रमाण प्रस्तुत करने में असमर्थ रहीं। तत्काल कार्रवाई में नाजिम को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। नाजमीन का मत है कि यह कानून मुस्लिम महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाया गया था, किंतु कुछ मामलों में इसका गलत उपयोग हो रहा है, जिसके लिए सरकारी स्तर पर निगरानी की आवश्यकता है।
- शाहगंज की एक युवती से जुड़ा है, जिनकी 2018 में हाथरस के एक युवक से शादी हुई। निकाह के पश्चात उन्हें पता चला कि युवक परिवार के दबाव में विवाह के लिए सहमत हुआ था और तुरंत तीन तलाक दे दिया। युवती ने पति एवं ससुराल वालों के विरुद्ध दहेज उत्पीड़न एवं तीन तलाक का मुकदमा दायर किया। जांच के दौरान पुलिस ने तीन तलाक की धारा को हटा दिया और केवल दहेज संबंधी आरोपों को चार्जशीट में शामिल किया, जो कानूनी प्रक्रिया की निष्पक्षता को रेखांकित करता है।
समग्र रूप से, मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण अधिनियम महिलाओं के वैवाहिक जीवन को सुरक्षित बनाने का सराहनीय प्रयास है। फिर भी, इसके दुरुपयोग की संभावनाओं को रोकने के लिए सतर्कता बरतना अनिवार्य है, ताकि यह विधान न्यायपूर्ण उद्देश्य की पूर्ति कर सके। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बढ़ते झूठे मुकदमे इसकी सफलता के संकेत हैं।
